नेपाली भाषाको झर्रो रूप र यसका रैथाने जराहरू
– डा. नवराज सुब्बा
१. उघारो (भूमिका)
विदेशी र संस्कृतका कडा एवम् भद्दारूपी शब्दहरूको ओइरोले जब नेपाली भाषाको सग्लो र चोखो रूप धमिलिन थाल्यो, तब २०१३ सालतिर बनारसको माटोबाट एउटा बलियो चेत जाग्यो— ‘झर्रोवादी आन्दोलन’। महानन्द सापकोटा, बालकृष्ण पोखरेल, र तारानाथ शर्माजस्ता भाषाका हस्तीहरूले सुरु गरेको यो अभियान कुनै जात वा धर्मविशेषको लहड थिएन। यो त नेपाली भाषाको आफ्नै जग, आफ्नै माटो र आफ्नै ढुकढुकीलाई जोगाउने स्वाभिमानी गर्जन थियो।
झर्रोवादको चुरो कुरो भनेकै भाषालाई कृत्रिम र क्लिष्ट हुनबाट बचाएर जनजिब्रोको नजिक राख्नु हो। नेपाली भाषा केवल भारोपेली (Indo-European) भाषा परिवारको मात्रै सम्पत्ति होइन; यसको नशा-नशामा नेपालकै पुराना रैथाने परिवारहरू— विशेषगरी भोट-बर्मेली (Tibeto-Burman) र आग्नेय (Austroasiatic) भाषाका तत्वहरू मिसिएका छन्। जब हामी ‘झ्याल’, ‘ढोका’ वा ‘कोदो’ भन्छौँ, तब हामी कुनै पराया शब्द बोलिरहेका हुँदैनौँ, बरु यही माटोका किराँत, नेवार, तामाङ, र मगर दाजुभाइले शताब्दीऔँदेखि जोगाएर राखेका झर्रा शब्दहरू बोलिरहेका हुन्छौँ। प्रस्तुत लेखमा तिनै रैथाने र झर्रा १०१ शब्दहरूको भाषावैज्ञानिक जरा र तिनका स्रोतहरूको खोजीनीति गरिएको छ।
२. भाषाको छिमेकी सम्बन्ध र झर्रो दर्शन
धेरैजसो मानिसमा नेपाली भाषाका सबै शब्द संस्कृतबाटै आएका हुन् भन्ने भ्रम छ। तर, भाषाशास्त्रीय ऐनाबाट हेर्दा नेपाली भाषाले आफ्नो विकासक्रममा यहाँका स्थानीय भोट-बर्मेली र आग्नेय भाषाहरूसँग निकै गहिरो मितेरी लगाएको देखिन्छ। झर्रोवादी आन्दोलनले संस्कृतका ‘गवाक्ष’ लाई मिल्काएर नेवारी मूलको ‘झ्याल’ लाई अँगाल्यो, ‘कपाट’ को साटो ‘ढोका’ रोज्यो। यो भाषिक शुद्धतावाद (Linguistic Purism) मात्र होइन, यो त नेपालका विभिन्न भाषाभाषीबीचको ऐतिहासिक सद्भाव र सहकार्यको प्रमाण पनि हो। हाम्रा भान्सा, खेतीपाती, नातागोता र प्राकृतिक बनोट बुझाउने धेरैजसो झर्रा शब्दहरू यहीँका रैथाने पहिचान हुन्।
३. १०१ झर्रा शब्दहरू र तिनका भाषावैज्ञानिक जराहरू
तलको तालिकामा नेपाली भाषामा भिजिसकेका १०१ झर्रा शब्दहरू, तिनको अर्थ/पर्याय, तिनको मूल भाषा परिवार र तिनको प्रामाणिक सन्दर्भस्रोत खुलाइएको छ।
(यहाँ सन्दर्भस्रोतका लागि: [१] बालकृष्ण पोखरेल (२०३१), [२] महानन्द सापकोटा (२०२०), र [३] चूडामणि बन्धु (२०७१) का कृतिहरूलाई मुख्य आधार बनाइएको छ।)
नेपाली भाषाका १०१ झर्रा शब्दहरू र तिनका रैथाने जराहरू
संस्कृत र विदेशी शब्दहरूको अन्धाधुन्ध मोह त्यागौँ, आफ्नै माटोका झर्रा शब्दहरूलाई निर्धक्क प्रयोग गरौँ! यहाँ नेपाली भाषामा भिजिसकेका १०१ झर्रा शब्दहरू, तिनका पर्याय, मूल भाषा परिवार र प्रामाणिक सन्दर्भस्रोत दिइएको छ।
| क्र.सं. | झर्रो शब्द | संस्कृत/विदेशी पर्यायले झर्रा शब्द हटाउन खोजिएका नमूना | स्रोत भाषा परिवार / मूल | सन्दर्भस्रोत |
| १ | झ्याल | गवाक्ष | भोट-बर्मेली (नेवार: झ्या) | [१] |
| २ | ढोका | कपाट / द्वार | भोट-बर्मेली (नेवार: ध्वाखा) | [१] |
| ३ | गुन्द्री | कट | भोट-बर्मेली (नेवार) | [२] |
| ४ | खाट | पर्यङ्क / पलङ | भोट-बर्मेली (नेवार: खाः) | [२] |
| ५ | कौसी | अट्टालिका / बार्दली | भोट-बर्मेली (नेवार: कौसी) | [१] |
| ६ | नाङ्लो | शूर्प | भोट-बर्मेली (नेवार) | [३] |
| ७ | खर्पन | भार | भोट-बर्मेली (नेवार: खम्पू) | [३] |
| ८ | मकल | अङ्गारधानी | भोट-बर्मेली (नेवार: मकल) | [२] |
| ९ | चुक | अम्लविशेष | भोट-बर्मेली (नेवार) | [१] |
| १० | ज्यापू | कृषक | भोट-बर्मेली (नेवार) | [१] |
| ११ | च्याउ | छत्रक | भोट-बर्मेली (मगर/किराँती मूल) | [१] |
| १२ | कोदो | प्रियङ्गु / मडुआ | भोट-बर्मेली मूल | [१] |
| १३ | फापर | कुल्थ | भोट-बर्मेली मूल | [२] |
| १४ | पिँडालु | आलुक | भोट-बर्मेली मूल | [२] |
| १५ | तामा | वंशाङ्कुर | भोट-बर्मेली (नेवार/तामाङ) | [१] |
| १६ | सिन्की | मूलक-विकार | भोट-बर्मेली मूल | [२] |
| १७ | गुम्बा | विहार | भोट-बर्मेली (तिब्बती) | [३] |
| १८ | लामा | बौद्ध गुरु | भोट-बर्मेली (तिब्बती) | [३] |
| १९ | सोल्टी | साला / मित्र | भोट-बर्मेली (तामाङ) | [१] |
| २० | सोल्टिनी | साली / सखी | भोट-बर्मेली (तामाङ) | [१] |
| २१ | तोङबा | मद्यविशेष | भोट-बर्मेली (लिम्बू) | [३] |
| २२ | सुकुटी | शुष्कमांस | भोट-बर्मेली (नेवार/मगर) | [२] |
| २३ | मस्यौरा | पिण्डक | भोट-बर्मेली मूल | [२] |
| २४ | सेल | पूप | भोट-बर्मेली मूल | [१] |
| २५ | डोको | वंशपात्र | भोट-बर्मेली (किराँती) | [१] |
| २६ | थुन्से | लघुवंशपात्र | भोट-बर्मेली मूल | [२] |
| २७ | पेरुङ्गो | पञ्जर | भोट-बर्मेली मूल | [२] |
| २८ | खुँडा | अस्त्रविशेष | भोट-बर्मेली मूल | [१] |
| २९ | पाङ्रा | चक्र | भोट-बर्मेली मूल | [१] |
| ३० | कप्टेरो | वंशखण्ड | भोट-बर्मेली मूल | [२] |
| ३१ | भ्यागुतो | मण्डूक | भोट-बर्मेली (नेवार: ब्यांचा) | [१] |
| ३२ | चमेरो | चर्मचटक | भोट-बर्मेली मूल | [२] |
| ३३ | टिमुर | तीक्ष्णफल | भोट-बर्मेली / रैथाने | [१] |
| ३४ | जिम्बु | शाकविशेष | भोट-बर्मेली मूल | [२] |
| ३५ | खोलो | नदी | भोट-बर्मेली मूल | [१] |
| ३६ | टहरो | कुटी | भोट-बर्मेली मूल | [२] |
| ३७ | मतान | बैठक कक्ष | भोट-बर्मेली मूल | [१] |
| ३८ | कुरुवा | रक्षक | भोट-बर्मेली मूल | [२] |
| ३९ | खुत्रुके | धनपात्र | भोट-बर्मेली मूल | [२] |
| ४१ | ग्याल्बो | राजा | भोट-बर्मेली (शेर्पा) | [३] |
| ४१ | छेवाङ | आयुवृद्धि | भोट-बर्मेली (तिब्बती) | [३] |
| ४२ | ट्होटे | उत्सवविशेष | भोट-बर्मेली (गुरुङ) | [३] |
| ४३ | साकेला | चण्डी नाच | भोट-बर्मेली (राई) | [३] |
| ४४ | चासोक | नवान्न पूजा | भोट-बर्मेली (लिम्बू) | [३] |
| ४५ | ल्होसार | नववर्ष | भोट-बर्मेली (गुरुङ/तामाङ/शेर्पा) | [३] |
| ४६ | म्हपुजा | आत्मपूजा | भोट-बर्मेली (नेवार) | [१] |
| ४७ | धिमाल | जातिविशेष | भोट-बर्मेली मूल | [३] |
| ४८ | गोंगबु | ग्रन्थि | भोट-बर्मेली (नेवार) | [१] |
| ४९ | गज्जी | वस्त्रखण्ड | भोट-बर्मेली मूल | [२] |
| ५० | डोले | शिविकावाहक | भोट-बर्मेली मूल | [१] |
| ५१ | केरा | कद्ली | आग्नेय (मुन्डा परिवार) | [१] |
| ५२ | कटर | पनस | आग्नेय (मुन्डा परिवार) | [१] |
| ५३ | पान | ताम्बुल | आग्नेय परिवार | [२] |
| ५४ | सुपारी | पूग | आग्नेय परिवार | [२] |
| ५५ | गैँडा | खड्गी | आग्नेय परिवार | [१] |
| ५६ | चामल | तण्डुल | आग्नेय (मुन्डा परिवार) | [१] |
| ५७ | मैजारो | अन्त्य / समापन | देशज (झर्रो रैथाने) | [२] |
| ५८ | सिस्नु | वृश्चिकशाक | देशज (झर्रो रैथाने) | [२] |
| ५९ | निहुरो | प्रतानविशेष | देशज (झर्रो रैथाने) | [१] |
| ६० | तरुल | कन्द | देशज (झर्रो रैथाने) | [२] |
| ६१ | गिठ्ठा | कन्दविशेष | देशज (झर्रो रैथाने) | [२] |
| ६२ | भ्याकुर | भेषजकन्द | देशज (झर्रो रैथाने) | [१] |
| ६३ | झिसमिसे | उषःकाल | देशज (ध्वन्यात्मक) | [२] |
| ६४ | झिस्रिक्क | प्रभात | देशज (ध्वन्यात्मक) | [२] |
| ६५ | भ्याइँभ्याइँ | प्रलाप | देशज (ध्वन्यात्मक) | [१] |
| ६६ | कटुस | फलविशेष | देशज (झर्रो रैथाने) | [२] |
| ६७ | चिलाउने | वृक्षविशेष | देशज (झर्रो रैथाने) | [१] |
| ६८ | उत्तिस | काष्ठविशेष | देशज (झर्रो रैथाने) | [१] |
| ६९ | खोटे | सरेजयुक्त | देशज (झर्रो रैथाने) | [२] |
| ७० | गएगुज्रेको | पतित | देशज (झर्रो रैथाने) | [२] |
| ७१ | ट्याम्के | शिखर / बाजा | देशज (झर्रो रैथाने) | [१] |
| ७२ | झ्याउरे | लोकछन्द | देशज (झर्रो रैथाने) | [१] |
| ७३ | टपरी | पत्रपात्र | देशज (झर्रो रैथाने) | [२] |
| ७४ | दुना | क्षुद्रपत्रपात्र | देशज (झर्रो रैथाने) | [२] |
| ७५ | बन्चरो | कुठार | देशज (झर्रो रैथाने) | [१] |
| ७६ | हँसिया | दात्र | देशज (झर्रो रैथाने) | [१] |
| ७७ | कुटो | खनित्र | देशज (झर्रो रैथाने) | [२] |
| ७८ | कोदालो | खनित्रविशेष | देशज (झर्रो रैथाने) | [२] |
| ७९ | मियो | मेढी | देशज (झर्रो रैथाने) | [१] |
| ८० | दाइँ | मर्डन | देशज (झर्रो रैथाने) | [१] |
| ८१ | गुन्यू | साडी | देशज (झर्रो रैथाने) | [२] |
| ८२ | चोलो | कञ्चुकी | देशज (झर्रो रैथाने) | [२] |
| ८३ | कछाड | कटिवस्त्र | देशज (झर्रो रैथाने) | [१] |
| ८४ | भोटो | अङ्गरखा | देशज (झर्रो रैथाने) | [१] |
| ८刻 | टोपी | शिरोभूषण | देशज (झर्रो रैथाने) | [२] |
| ८६ | पटुका | कटिबन्ध | देशज (झर्रो रैथाने) | [२] |
| ८७ | मजेत्रो | ओढनी | देशज (झर्रो रैथाने) | [१] |
| ८८ | गाजल | अञ्जन | देशज (झर्रो रैथाने) | [२] |
| ८९ | पोते | काचमणि | देशज (झर्रो रैथाने) | [२] |
| ९० | तिलहरी | सुवर्णभूषण | देशज (झर्रो रैथाने) | [१] |
| ९१ | बुलाकी | नासाभूषण | देशज (झर्रो रैथाने) | [१] |
| ९२ | ढुङ्गरी | कर्णभूषण | देशज (झर्रो रैथाने) | [२] |
| ९३ | बाजु | अङ्गद | देशज (झर्रो रैथाने) | [१] |
| ९४ | पङ्गा | हिलो / झमेला | देशज (झर्रो रैथाने) | [२] |
| ९५ | खिर्रो | क्षीरवृक्ष | देशज (झर्रो रैथाने) | [२] |
| ९६ | धोध्रो | कोटर | देशज (झर्रो रैथाने) | [१] |
| ९७ | भ्यांग | रिक्तता | देशज (झर्रो रैथाने) | [२] |
| ९८ | झ्याप्प | अकस्मात | देशज (ध्वन्यात्मक) | [१] |
| ९९ | खुरमुर | अस्तव्यस्त | देशज (झर्रो रैथाने) | [२] |
| १०० | खस्रो | अचकन | देशज (झर्रो रैथाने) | [१] |
| १०१ | चिप्लो | पिच्छिल | देशज (झर्रो रैथाने) | [१] |
४. भाषिक घामछायाँ र गहिरो विश्लेषण
माथिको लामो टिपोट (तालिका) लाई हेर्दा हामी के बुझ्न सक्छौँ भने, नेपाली भाषालाई जीवन्त राख्न हाम्रा रैथाने दाजुभाइका भाषाहरूको कति ठूलो गुन छ। बालकृष्ण पोखरेलले आफ्नो नामी ग्रन्थ नेपाली भाषा र साहित्य (२०३१) मा भनेका छन् कि भाषा जति माटोसँग जोडिन्छ, त्यति नै कसिलो र भरपर्दो हुन्छ।
उदाहरणका लागि, जब हामी भान्सामा पसेर ‘पिँडालु’, ‘तामा’, ‘सिन्की’, र ‘च्याउ’ को तरकारी पकाउँछौँ, तब हामी कुनै पराई वा आयातीत संस्कृति खाइरहेका हुँदैनौँ। ती शब्दहरू भोट-बर्मेली परिवारका विभिन्न हाँगाबिँगाबाट नेपाली जनजिब्रोमा यसरी घुलमुल भएका छन् कि तिनलाई छुट्याउनै सकिँदैन।
त्यस्तै, आग्नेय (Austroasiatic) परिवारका मुन्डा भाषाहरूबाट आएका ‘केरा’, ‘चामल’ र ‘कटर’ जस्ता शब्दहरूले हाम्रो दैनिक जीवनको गर्जो टारेका छन्। यदि झर्रोवादी आन्दोलनले यी शब्दहरूलाई काख नथपेको भए आज हामी ‘कद्लीफल’ वा ‘तण्डुल’ जस्ता ओभानो र अपरिचित शब्दको भारी बोकेर हिँड्न बाध्य हुने थियौँ।
झर्रोवादको अर्थ अरू भाषालाई घृणा गर्नु किमार्थ होइन। यसको खास मर्म त आफ्नो घरमा मकैको आटो छँदाछँदै छिमेकीको जुठो भात माग्न नजानु हो। नेपाली भाषामा क्रियापद र व्याकरणको जग खस प्राकृत र भारोपेली भए तापनि यसको नामपद (Nouns) को भण्डारमा रैथाने नेपालकै माटोको सुगन्ध छ। ध्वन्यात्मक शब्दहरू जस्तै: ‘झिसमिसे’, ‘झ्याप्प’, ‘झिस्रिक्क’ ले नेपाली भाषालाई अन्य भाषाको तुलनामा बढी रसिलो र तस्बिरजस्तै छर्लङ्ग पार्ने तागत दिएका छन्।
५. बिटो (निष्कर्ष)
नेपाली भाषाको शुद्धता र यसको झर्रो रूप बचाउने लडाइँ अझै सकिएको छैन। एकातिर संस्कृतका पण्डितहरूबाट नेपाली भाषालाई जोगाउनु परेको थियो भने अर्कातिर अङ्ग्रेजी र सहरीया ‘हाइब्रिड’ (मिश्रित) भाषाहरूको चंगुलबाट भाषालाई जोगाउनु परेको छ। आफ्नै आँगनमा फुलेका ‘चिलाउने’ र ‘उत्तिस’ लाई बिर्सेर विदेशी फूलको गन्धमा झुम्नु भाषिक दासता हो।
१०१ शब्दहरूको यो छोटो खोजीले के देखाउँछ भने, नेपाली भाषाको वास्तविक बैँस र सुन्दरता यसका रैथाने जराहरूमै लुकेको छ। हामीले जति धेरै झर्रा शब्दहरूको प्रयोग गर्छौँ, त्यति नै हाम्रो नेपालीपन बलियो हुन्छ। तसर्थ, आउनुहोस्, अचाक्ली संस्कृत, विदेशी र क्लिष्ट शब्दहरूको मोह त्यागौँ, र आफ्नै माटोबाट उम्रेका झर्रा शब्दहरूलाई निर्धक्कसँग बोल्ने र लेख्ने बानी बसालौँ। यही नै सच्चा झर्रोवादी र नेपाली हुनुको गौरव हो।
सन्दर्भ सामग्रीहरू
१. पोखरेल, बालकृष्ण (२०३१). नेपाली भाषा र साहित्य. काठमाडौँ: साझा प्रकाशन।
२. सापकोटा, महानन्द (२०२०). नेपाली शब्द-परिचय. विराटनगर: पूर्वाञ्चल पुस्तक भण्डार।
३. बन्धु, चूडामणि (२०७१). भाषाविज्ञान. काठमाडौँ: साझा प्रकाशन।
